Wednesday, January 1, 2014

खुलती जाती हैं गांठें

गहरा है माया का जाल
माया की भाषा में सच नहीं बंधता
वो जानते हैं भाषा का मर्म
वो कहते हैं सहलाने नहीं,
समझने-समझाने की चीज है मर्म
 कौन समझाए उनको
क्यों समझ में आता नहीं मर्म
कभी उसे सहला कर देखो
देखो कैसे खुलती जाती हैं गाठें  



 

एक और साल

मुट्ठी में बंद थीं उम्मीदें
भींची थी मुट्ठी कस के
पसीने-पसीने हो सरक गया
रीत गया एक साल
बीत गया एक साल
दोस्तों की बधा‌इयों से उपजा
घड़ी की टिक-टिक से निकला
छल गया एक और साल 
 

Sunday, November 17, 2013

इस घाट पर, उस घाट पर


रेत की सतह से उठता चांद
रश्मियां फेंकता है हर घाट पर
पानी पर तैरती किरणों का सोना
लुटता है हर एक घाट पर
 
नाविक जानते हैं नहीं टिकतीं
चांद की सोना किरणें पानी पर
किसी घाट पर नहीं लुटाता रश्मियां
चांद की किरणें की यह अदा है झूठ
झूठ है होना‌ रश्मियों का हर घाट पर
 
बुजुर्गों ने मोक्ष नगरी के निवासियों से
कहा था कभी कि सब कुछ है मिथ्या
चांद, नदी, घाट, रश्मियां, उत्सव और हम
माया नगरी है, लुट जाएगी
मोनू माझी को है इस बात पर भरोसा
फिर भी उसे खेनी पड़ती है नाव
इस घाट पर, उस घाट पर, हर घाट पर
 

-अजय राय 

Saturday, November 9, 2013

केवल नदी नहीं मरती



रेत है, पानी है, रवानी है
यह गंगा है, इस जमाने की एक नदी है

बुढ़वा मंगल, नाग नथैया
तमाम महोत्सव की ताता थैया
भगीरथ के पुरखों को तारने वाली
गंगा, नदी है पानी, कीचड़ काई से भरी

स्नान, मुक्ति, ठगी, ढोंग, मोक्ष
पंडों, पुरोहितयों, किवंदतियों
और मिथकों की दास्तान
गंगा है जो नदी है, जिसमें पानी है
रेत है, मछलियां हैं, मगरमच्छ हैं

सरस्वती एक नदी थी, उफनाती हुई
भागती-दौड़ती, पानी से लबालब भरी
उसके तट पर रोज होते थे उत्सव
सरस्वती अब खोज है, इतिहास है
जहां सरस्वती बहती थी, वहां लेटी हुई है रेत

सुना‌ है नदी हमेशा नदी ही नहीं रहती
कहानियों, किस्सों, झूठ और फरेब से घिर
एक दिन वह दफ्न हो जाती है जमी‌न में
बन जाती है रेत, सरस्वती की तरह।

गंगा में रेत है, पानी है और रवानी है
गंगा, अभी एक नदी है, जिंदगी है
थोड़ा संभालिए खुद को
क्योंकि नदी केवल नदी नहीं होती मरते वक्त
उसके साथ दफ्न हो जाती है एक सभ्यता भी।

अजय राय-धूमिल जयंती पर 

Sunday, October 13, 2013

बारिश सिर्फ बारिश नहीं होती

 आसमान से जब बरसती हैं बूंदें
तब वर्षा सिर्फ बारिश नहीं होती

कभी पानी की बूंदों के संग बरसती है खुशी
कभी पानी की बूंदों के साथ आती है सर्दी
कभी मोती जैसी बूंदों में घुल कर आती है जिंदगी
कभी बूंद-बूंद बरस जाती है तबाही

आसमान से जब बरसती हैं बूंदें
तब वर्षा सिर्फ बारिश नहीं होती

बूंदों में घुल मिलकर बरसती है तेजाब
बूंद-बूंद मिलकर बन जाता है सैलाब
बारिश की बूंदें गिरती हैं बनकर अनेक
धरती पर होकर एक, बनती हैं सैलाब

सैलाब जो बहा ले जाता है सब कुछ
सैलाब जो बहा ले जाता है सपने, अपने

कैसे कहूं, आसमान से बरसती बू्ंदें
हमेशा वर्षा नहीं होतीं, हरियाली नहीं होतीं

Saturday, October 12, 2013

रावण से नहीं डरता

रावण अंकल मुंह खोले, थोड़ा बड़ा
ताकि भीतर से रंग दूं लाल-लाल
जब नाभि में लगे राम का अग्निबाण
बदन में लगी आठ से उठी लपटों में
दमके बनारसी पान जमा मुखड़ा।

नन्हा रहमान नहीं डरता रावण से
पुतले की खूंखार मूंछें, लपलपाती जीभ रंगते वक्त
नहीं डरता है जब ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है बारूद
वह डरता है तब, जब छिड़ती है लंका में जंग
जब दौड़ने लगती है वानरी सेना नारा लगाती हुई।
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-अजय राय

दशानन अबकी हार भी जाओ ना


दशानन अबकी हार भी जाओ ना

जब अपने शीश चढ़ाया बार-बार तुमने
तब क्यों रोका यज्ञ में बलि की प्रथा दशानन

जंगल में तपस्वी हो रहे परेशान
राक्षस भंग कर रहे उनका तप
हत्यारे घूम रहे सत्ता पर काबिज होने
राम उलझ गए राजनीतिक मुद्दे में

दशानन तुम पर आई जिम्मेदारी भारी
अबकी बार तुम खुद ही हारो ना।


ज्ञानेंद्रियां हैं धोखा, कर्मेंद्रियां छलावा
तुम तो ठहरे ज्ञानी, समय की मांग समझो
हार ही में जीत है लंकेश इसे समझाओ
अबकी सबको बता कर हार जाओ ना
दशानन अबकी हार भी जाओ ना।


-अजय राय